सहारनपुर। रमज़ान का मुक़द्दस महीना अपने आख़िरी अशरे में दाख़िल हो चुका है। यह अशरा जहन्नम से आज़ादी और मग़फ़िरत का है, जिसमें अल्लाह अपने बंदों पर रहमतों की बारिश करता है। लेकिन अफ़सोस की बात है कि आजकल हमारे मुसलमान भाई-बहन, ख़ासकर नौजवान, इस बेशकीमती वक़्त को इबादत और तौबा में गुज़ारने के बजाय बाज़ारों, होटलों और सैर-सपाटे में ज़ाया कर रहे हैं।
इस पर अफ़सोस का इज़हार करते हुए जमीयत दावतुल मुस्लिमीन के संरक्षक और प्रसिद्ध आलिम-ए-दीन मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा ने कहा कि रमज़ान का आख़िरी अशरा बहुत ही अहमियत रखता है। यह वह दिन और रातें हैं जिनमें अल्लाह से अपने गुनाहों की माफ़ी माँगने, जन्नत की दुआ करने और जहन्नम से निजात की कोशिश करने का बेहतरीन मौक़ा मिलता है।
मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा ने कहा कि यह बहुत अफ़सोसनाक है कि इस पाक महीने की सबसे क़ीमती रातों में लोग मस्जिदों की बजाय शॉपिंग मॉल, होटलों और फ़ालतू गप्पबाज़ी में वक़्त बर्बाद कर रहे हैं। उन्होंने मुसलमानों, ख़ासकर नौजवानों से अपील की कि वे बाज़ारों और होटलों की रौनक़ बनने के बजाय मस्जिदों की रौनक़ बनें, ताकि अल्लाह की रहमत से फ़ायदा उठा सकें।
मौलाना ने कहा कि अल्लाह अपने नेक बंदों को इस अशरे में ख़ास इनाम से नवाज़ता है। जो लोग इस महीने को सही तरीक़े से गुज़ारते हैं, वे क़यामत के दिन अल्लाह की रहमत के हक़दार बनते हैं। आख़िरी अशरे में एक रात शबे क़द्र भी आती है, जिसे इबादतों से भरना चाहिए, क्योंकि यह रात हज़ार महीनों से बेहतर है।
- मौलाना गोरा ने मुसलमानों से गुज़ारिश की कि वे अपने आमाल का जायज़ा लें और रमज़ान के इस पाक अशरे को ग़फ़लत में बर्बाद करने के बजाय अल्लाह की इबादत, तिलावत-ए-क़ुरआन, तौबा और इस्तिग़फ़ार में गुज़ारें। उन्होंने कहा कि बाज़ारों और होटलों में वक़्त ज़ाया करने के बजाय मस्जिदों में बैठें, अल्लाह से दुआ करें और अपने ईमान को मज़बूत करें।
आख़िर में, मौलाना ने कहा कि रमज़ान सिर्फ़ भूखा-प्यासा रहने का नाम नहीं, बल्कि अपने गुनाहों से पाक होने, नेकी करने और अपनी ज़िंदगी को इस्लाम के मुताबिक़ ढालने का सुनहरी मौक़ा है। उन्होंने मुसलमानों को तजवीज़ दी कि इस महीने के आख़िरी लम्हों को क़ीमती समझें और अल्लाह की रहमतों से मालामाल होने की कोशिश करें।









